Amitabh Bachan recites Prasoon Joshi’ poem on 26/11. The poem is in blank verse but effectively expresses the frustrations of the common man at the usual platitudes that follow every such incident: those about India’s resilience, spirit, courage and the ability to move on. I like it.
इस बार नहीं
इस बार जब वो छोटी सी बच्ची मेरे पास अपने खरोंच ले कर आएगी
मैं उसे फू-फू कर के नहीं बहलाऊंगा
पनपने दूंगा उसके टीस को
इस बार नहीं
इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा
नहीं गाऊंगा गीत पीड़ा भुला देने वाले
दर्द को रिसने दूंगा, उतरने दूंगा अन्दर गहरे
इस बार नहीं
इस बार मैं न मरहम लगाऊँगा
न ही उठाऊंगा रूई के फाहे
और न ही कहूँगा कि तुम आँखें बंद कर लो, गर्दन उधर कर लो
मैं दवा लगाता हूँ
इस बार नहीं
इस बार जब उलझनें देखूँगा, छटपटाहट देखूँगा
नहीं दौडूंगा उलझी डोर लपेटने
उलझने दूंगा जब तक उलझ सके
इस बार नहीं
इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औज़ार
नहीं करूंगा फिर से एक नयी शुरुआत
नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की
नहीं आने दूंगा ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर
उतरने दूंगा उसे कीचड में, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर
नहीं सूखने दूंगा दीवारों पर लगा खून
हल्का नहीं पड़ने दूंगा उसका रंग
इस बार नहीं बनने दूंगा उसे इतना लाचार
कि पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए
इस बार नहीं
इस बार घावों को देखना है
गौर से
थोडा लम्बे वक़्त तक
कुछ फैसले
और उसके बाद हौसले
कहीं तो शुरुआत करनी होगी
इस बार यही तय किया है