सिंहासन खाली करो कि जनता आती है: रामधारी सिंह “दिनकर”

अब एक कविता हिंदी की भी| दिनकर ने ये कविता हमारे पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर लिखी थी| फिर ये १९७४ के संपूर्ण-क्रांति का भी नारा बनी|चलिए आज फिर दोहराते हैं:

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता?हां,लंबी – बडी जीभ की वही कसम,
“जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।”
“सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?”
‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?”

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

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3 Responses to “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है: रामधारी सिंह “दिनकर””

  1. Adarsh Kumar Says:

    Dinkar sir ne jo lika wo jitna kal uttezak tha ….utna hi aaj he or sayad aaj iski jyada zaroorat he qki aaj unke jaise likne waalo ki kami ho gyee he, ya kahe aaj ke kaviyon me desh prem ki bhawana hi khatam ho gyee he ..aaj ek bhi desh prem ke geet or kavitaen nahi aati.

  2. DURGESH Says:

    U R BEST SIR FOR HINDI HISTORY

  3. AJAY PRATAP SINGH Says:

    Kewal ek sansodhan ke alawa sab kuch aaj bhi sach hai, aaj hum taintees koti se 125 koti ho gaye hain.
    yah sahi arthon me ‘kaal jayi’ kavita hai. shayad sadiyon tak ye baaten ekdum shandaar rahengi . log jab bhi ise padhenge , ye ek dum jhakjhor dengi.

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