Archive for the ‘Geet, Ghazal, Kavita’ Category

Madhushala (Audio/Videos)

November 30, 2009

Madhushala is easily the most well read hindi poetry of modern times. Only bhakti poets like Tulsidas, Surdas, Kabir achieved greater popularity. With Madhushala, Harivansh Rai Bachhan introduced Rubaii to Hindi readers. Rubaii is  a quatrain where the first, third and fourth lines rhyme with each other while the second line does not.

Here I share audio/video editions of Madhushala sung by Manna De and Amitabh Bachchan.

Manna De Part1 (First few lines in Harivansh Rai Bachchan’s own voice)

Manna De Part 2

Manna De Part 3

Manna De Part 4

Amitabh Bachchan

इस बार नहीं: प्रसून जोशी

November 24, 2009

Amitabh Bachan recites Prasoon Joshi’ poem on 26/11. The poem is in blank verse but effectively expresses the frustrations of the common man at the usual platitudes that follow every such incident: those about India’s resilience, spirit, courage and the ability to move on. I like it.

इस बार नहीं

इस बार जब वो छोटी सी बच्ची मेरे पास अपने खरोंच ले कर आएगी

मैं उसे फू-फू कर के नहीं बहलाऊंगा

पनपने दूंगा उसके टीस को

इस बार नहीं

इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूँगा

नहीं गाऊंगा गीत पीड़ा भुला देने वाले

दर्द को रिसने दूंगा, उतरने दूंगा अन्दर गहरे

इस बार नहीं

इस बार मैं न मरहम लगाऊँगा

न ही उठाऊंगा रूई के फाहे

और न ही कहूँगा कि तुम आँखें बंद कर लो, गर्दन उधर कर लो

मैं दवा  लगाता हूँ

इस बार नहीं

इस बार जब उलझनें देखूँगा, छटपटाहट देखूँगा

नहीं दौडूंगा उलझी डोर लपेटने

उलझने दूंगा जब तक उलझ सके

इस बार नहीं

इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊँगा औज़ार

नहीं करूंगा फिर से एक नयी शुरुआत

नहीं बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की

नहीं आने दूंगा ज़िन्दगी को आसानी से पटरी पर

उतरने दूंगा उसे कीचड में, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर

नहीं सूखने दूंगा दीवारों पर लगा खून

हल्का नहीं पड़ने दूंगा उसका रंग

इस बार नहीं बनने दूंगा उसे इतना लाचार

कि पान की पीक और खून का फर्क ही ख़त्म हो जाए

इस बार नहीं

इस बार घावों को देखना है

गौर से

थोडा लम्बे वक़्त तक

कुछ फैसले

और उसके बाद हौसले

कहीं तो शुरुआत करनी होगी

इस बार यही तय किया है

कुछ इश्क किया, कुछ काम किया : फैज़ अहमद फैज़

November 2, 2009

वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं: बालस्वरूप राही

November 1, 2009
कटीले शूल भी दुलरा रहे हैं पाँव को मेरे
कहीं तुम पंथ पर पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं!

हवाओं में न जाने आज क्यों कुछ-कुछ नमी-सी है,
डगर की उष्णता में भी न जाने क्यों कमी-सी है,
गगन पर बदलियाँ लहरा रही हैं श्याम-आँचल-सी
कहीं तुम नयन में सावन छिपाए तो नहीं बैठीं।

अमावस की दुल्हन सोई हुई है अवनि से लगकर,
न जाने तारिकाएँ बाट किसकी जोहतीं जग कर,
गहन तम है डगर मेरी मगर फिर भी चमकती है,
कहीं तुम द्वार पर दीपक जलाए तो नहीं बैठीं !

हुई कुछ बात ऐसी फूल भी फीके पड़ जाते,
सितारे भी चमक पर आज तो अपनी न इतराते,
बहुत शरमा रहा है बदलियों की ओट में चन्दा
कहीं तुम आँख में काजल लगाए तो नहीं बैठीं!

कटीले शूल भी दुलरा रहे हैं पाँव को मेरे,
कहीं तुम पंथ सिर पलकें बिछाए तो नहीं बैठीं।

बेक़रारी की बेक़रारी है:जॉन एलिया

October 21, 2009
बेक़रारी  की बेक़रारी है
वस्ल है और फ़िराकदारी है

जो गुजारी न जा सकी हमसे
हमने वो ज़िन्दगी गुजारी है

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है

हादसों का हिसाब है अपना
वरना हर आन सबकी बारी है

उससे कहियो कि दिल कि गलियों में
रात दिन तेरी इंतेजारी है

खुश रहे तू कि ज़िन्दगी अपनी
उम्र भर की उम्मीदवारी है

हिज्र हो या विसाल हो कुछ हो
हम हैं और उसकी यादगारी है

ज़िन्दगी खाब क्यों दिखाती है: जॉन एलिया

October 20, 2009
आप अपने से हमसुखन रहना
हमनशीं सांस फूल जाती है
 
आज एक बात तो बताओ मुझे
ज़िन्दगी खाब क्यों दिखाती है
 
क्या सितम है कि अब तेरी सूरत
गौर करने पे याद आती है 
 
कौन इस घर की देखभाल करे 
रोज़ एक चीज़ टूट जाती है  

जॉन एलिया की एक और कृति

October 18, 2009
जॉन एलिया बड़े मशहूर शायर हैं|उनके चाहने वाले उन्हें बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का सबसे अच्छा शायर मानते हैं|पर मैंने पहले कभी न उनका नाम सुना था,न उनका लिखा कोई शेर पढ़ा था|ऐसा शायद इसलिए हो कि उनका पहला दीवान, शायद, सन् १९९० में छपा जब वो साठ साल के हुए|उनके बाकी दो दीवान, यानि और गुमान,  मरणोपरांत छपे|शायद तीनो ही दीवानों का अब तक देवनागरी संस्करण छपा भी न हो|इसलिए भारत में कम लोग उनको जानते हैं|मैंने उनको अभी-२ दो दिन पहले डिस्कवर किया; मुझे बेहद पसंद आये|तो ये हफ्ता जॉन एलिया के  नाम  रहेगा|पेश है उनकी एक और कृति|
 
उसके पहलू से लग के चलते हैं
हम  कहीं टालने  से डरते हैं
 
मैं उसी तरह तो बहलता हूँ
और सब जिस तरह बहलते हैं
 
वो  है जान अब हरेक महफिल कि
हम भी अब घर से कब निकलते हैं
 
क्या तकल्लुफ करें ये कहने में
जो भी खुश है हम उस से जलते हैं
 
है उसे दूर का सफ़र दरपेश
हम संभाले नहीं सँभालते हैं
 
है अजब फासले का सेहरा भी
चल न पड़िये तो पाँव जलते हैं
 
हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं
 
तुम बनो रंग तुम बनो खुशबू
हम तो अपने सुखन में ढलते हैं
 
 

तुम जब आओगी : जॉन एलिया (1931-2002)

October 16, 2009
तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तनहाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं

मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं

इन किताबों ने बडा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन-में एक रम्ज़ है, जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़हन

मुज़दा*-ए-इशरते* अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
 
* रम्ज़=hint, symbol, secret;  मुज़दा = good news; इशरत*=gaiety, happy social life

मुँह की बात: निदा फ़ाज़ली

October 11, 2009

Munh ki baat was the title song of  “Neem Ka Ped”: an old TV serial based on an eponymous novel by Rahi Masoom Raza. Jagjit Singh sung it beautifully. Enjoy! 

मुँह की बात सुने हर कोई
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में
ख़ामोशी पहचाने कौन ।

सदियों-सदियों वही तमाशा
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं
खो जाता है जाने कौन ।

जाने क्या-क्या बोल रहा था
सरहद, प्यार, किताबें, ख़ून
कल मेरी नींदों में छुपकर
जाग रहा था जाने कौन ।

मैं उसकी परछाई हूँ या
वो मेरा आईना है
मेरे ही घर में रहता है
मेरे जैसा जाने कौन ।

किरन-किरन अलसाता सूरज
पलक-पलक खुलती नींदें
धीमे-धीमे बिखर रहा है
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन |

 While Nida Fazli says:

मुंह कि बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन
Bashir Badra writes:
मैं चुप था तो बहती हवा रूक गयी
जुबां सब समझते जज़्बात की
Who do you think is closer to truth?

बालिका से वधु तक: रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974)

October 6, 2009
विद्यापति के बाद रामधारी सिंह दिनकर शायद बिहार के महानतम कवि हैं| आम तौर पर दिनकर को वीर रस कि कविताओं के लिए जाना जाता है| पर हुंकार और परशुराम की  प्रतीक्षा लिखने वाले कवि ने ही बालिका से वधु तक भी लिखा है| “बालिका से वधु तक” दिनकर की कविताओं में मेरी प्रिय कविता है|

माथे में सेंदूर पर छोटी दो बिंदी चमचम-सी,
पपनी पर आँसू की बूँदें मोती-सी, शबनम-सी।
लदी हुई कलियों में मादक टहनी एक नरम-सी,
यौवन की विनती-सी भोली, गुमसुम खड़ी शरम-सी।

पीला चीर, कोर में जिसकी चकमक गोटा-जाली,
चली पिया के गांव उमर के सोलह फूलोंवाली।
पी चुपके आनंद, उदासी भरे सजल चितवन में,
आँसू में भींगी माया चुपचाप खड़ी आंगन में।

आँखों में दे आँख हेरती हैं उसको जब सखियाँ,
मुस्की आ जाती मुख पर, हँस देती रोती अँखियाँ।
पर, समेट लेती शरमाकर बिखरी-सी मुस्कान,
मिट्टी उकसाने लगती है अपराधिनी-समान।

भींग रहा मीठी उमंग से दिल का कोना-कोना,
भीतर-भीतर हँसी देख लो, बाहर-बाहर रोना।
तू वह, जो झुरमुट पर आयी हँसती कनक-कली-सी,
तू वह, जो फूटी शराब की निर्झरिणी पतली-सी।

तू वह, रचकर जिसे प्रकृति ने अपना किया सिंगार,
तू वह जो धूसर में आयी सुबज रंग की धार।
मां की ढीठ दुलार! पिता की ओ लजवंती भोली,
ले जायेगी हिय की मणि को अभी पिया की डोली।

कहो, कौन होगी इस घर तब शीतल उजियारी?
किसे देख हँस-हँस कर फूलेगी सरसों की क्यारी?
वृक्ष रीझ कर किसे करेंगे पहला फल अर्पण-सा?
झुकते किसको देख पोखरा चमकेगा दर्पण-सा?

किसके बाल ओज भर देंगे खुलकर मंद पवन में?
पड़ जायेगी जान देखकर किसको चंद्र-किरन में?
महँ-महँ कर मंजरी गले से मिल किसको चूमेगी?
कौन खेत में खड़ी फ़सल की देवी-सी झूमेगी?

बनी फिरेगी कौन बोलती प्रतिमा हरियाली की?
कौन रूह होगी इस धरती फल-फूलों वाली की?
हँसकर हृदय पहन लेता जब कठिन प्रेम-ज़ंजीर,
खुलकर तब बजते न सुहागिन, पाँवों के मंजीर।

घड़ी गिनी जाती तब निशिदिन उँगली की पोरों पर,
प्रिय की याद झूलती है साँसों के हिंडोरों पर।
पलती है दिल का रस पीकर सबसे प्यारी पीर,
बनती है बिगड़ती रहती पुतली में तस्वीर।

पड़ जाता चस्का जब मोहक प्रेम-सुधा पीने का,
सारा स्वाद बदल जाता है दुनिया में जीने का।
मंगलमय हो पंथ सुहागिन, यह मेरा वरदान;
हरसिंगार की टहनी-से फूलें तेरे अरमान।

जगे हृदय को शीतल करनेवाली मीठी पीर,
निज को डुबो सके निज में, मन हो इतना गंभीर।
छाया करती रहे सदा तुझको सुहाग की छाँह,
सुख-दुख में ग्रीवा के नीचे हो प्रियतम की बाँह।

पल-पल मंगल-लग्न, ज़िंदगी के दिन-दिन त्यौहार,
उर का प्रेम फूटकर हो आँचल में उजली धार।